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Wednesday
Gurudev ne kaha
प्रशन १ : देह और जीव का का क्या सम्बन्ध है?
उत्तर : जीव और देह का सम्बन्ध मालिक और मकान के मुताबिक ( अनुसार ) है , अर्थात शरीर रूप मकान में जीव रूप मालिक है . गीता में अधिभूत , अधिदेव , अध्यातम सवरूप प्रकृति का मालिक अधियज्ञ स्वरूप जीवन शक्ति का बयान है . इस का विचार करें.
प्रशन २ : देह और संसार का क्या भेद है ?
उत्तर : देह और संसार का भेद कोई नहीं है अर्थात देह धारण करने से संसार का निर्वाह चलता दिखाई देता है . देह के नाश होने पर जाहिरी ( प्रत्यक्ष ) संसार लोप होजाता है . देह और संसार का एक ही रूप है . देह करके संसार है . असलियत में संसार कोई चीज़ नहीं है . जैसी जिसकी देह है वैसे उसका संसार है . इसलिए देह पर काबू पाने से संसार पर काबू पाया जाया सकता है . यह निश्चय करें .
प्रशन ३ : महाराज जी संसार क्या है ?
उत्तर : संसार शकूक ( शंकाओं ) का समुद्र है
Sunday
गौतम बुद्ध व् उनके परम शिष्य आनन्द का संवाद

कुछ प्रशन और गुरुदेव के उत्तर
वह पावन पुरुष ऐसा था जिसके पास हर समस्या का समाधान और हर प्रशन का उत्तर था । और फिर संसार से अलग रह कर भी संसारी कमजोरियों को जानता , पहचानता था । आप कैसे भी प्रशन क्यों न करें उत्तर तुरन्त मिलता था।
- एक बार एक प्रोफ़ेसर ने पूछा : - "आपका मजनू के बारे में क्या ख्याल है ?" (कोई दूसरा संत होता तो मजनू कानाम सुनकर झेंप जाता ) ।
- आपने बिना झिझक के उठतात दिया : - "लाल जी ! उसकी वृति वाकई ( वास्तव में) काबिल- ऐ-तारिकसराहनीय) थी ।"
- किसी ने पूछा : महाराज जी ! फाज़िल (विद्वान्) कैसे बन सकते है ?
- आपका उत्तर था : - कामिल फकीर की सीख से आमिल बनोगे तो फजील खुद-बी-खुद बन जाओगे।
- किसी ने पूछा :- " महाराज जी ! कभी बैठे बिठाये संसार से मन उचाट होजाता है , मन पर एक अदभुत सी उदासीछा जाती है !"
- आपका उत्तर था : - " लाल जी ! आपने अभी तक अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित ही नहीं किया । बिना लक्ष्य के जीवन व्यतीत करने वाले का ऐसा ही हाल होता है.
सतगुरु जी का फरमान
अपनी तमाम खुदगर्ज़ी और स्वार्थ का त्याग कर देना , केवल प्रभु आज्ञा में निश्चित होकर तमाम जीवों की कल्याण करनी और कल्याण चाहनी , अपनी शक्ति के मुताबिक, यह भावना ईशवर परायणता है । यानि एक ईशवर के द्रिढ़ परायण होने से देह की शुद्धी , खानदान यानि कुल की शुद्धी , समाज की शुद्धी या उन्नति और देश की उन्नति या पवित्रता गुनी पुरुष कर सकता है और इसी ईश्वरीय नियम के अनुकूल चलकर अपने आपका सुधार भी कर सकता है । यानि तमाम खुदगर्ज़ी को त्याग करके अपने फ़र्ज़ को समझते हुए नीराभिमान होकर यथाशक्ति तमाम जीवों का कल्याण करना ही असली शान्ति प्राप्ति का साधन है ।
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